Friday, 27 January 2012
Friday, 20 January 2012
सोचा न था...
जिंदगी के तूफ़ान में एक ऐसा भी तूफ़ान आयेगा,
सोचा न था..
सख्त इंसा,मुझपे यु मेहेरबा हो जायेगा,
सोचा न था..
जाने क्यों उन्ही का रूठ जाना रास नहीं आता,
बेबसी के आलम में उनके और करीब होती जाती हूँ,
फासलें बढ़ाके,मुझे तनहा कर जायेगा..
सोचा न था..
सिलसिले बनाके,इतना याद आयेगा..
सोचा न था..
जाने क्यों उन्ही के इशारों पे एतराज़ नहीं होता
जब भी ताकता हैं वो मुझे..
निगाहों के उन घने सैलाबों में डूबती जाती हूँ !
किसी का इशारा,इतना रंग लाएगा,
सोचा न था..
किसी का साथ,मीलों के सफ़र तय करवाएगा
सोचा न था..
जिंदगी के तूफ़ान में एक ऐसा भी तूफ़ान आयेगा,
सोचा न था..
सख्त इंसा,मुझपे यु मेहेरबा हो जायेगा,
सोचा न था..
तुम हो...
सुबह का पहला ख्याल तुम हो,
मेरी जिंदगी का पहला सलाम तुम हो,
झील से बहेता गुलाब तुम हो..
यादों का मेरी हिसाब तुम हो..
खुली आँखों से देखा एक ख़्वाब तुम हो,
बरसो ढूँढा जिसे वो जवाब तुम हो,
झील से बहेता गुलाब तुम हो..
यादों का मेरी हिसाब तुम हो..
इंतज़ार मुझे है,बेताब तुम हो,
गजलों की मेरी किताब तुम हो,
झील से बहेता गुलाब तुम हो..
यादों का मेरी हिसाब तुम हो..
सलामती का जैसे आदाब तुम हो,
बेकरारी का मेरी,हाल तुम हो,
झील से बहेता गुलाब तुम हो..
यादों का मेरी हिसाब तुम हो..
Monday, 16 January 2012
सिलसिला ..
वो करीब है फिर नज़रे झुका के गुज़र जाना है
क्या कहू ये सिलसिला मुश्किल लगता बताना है
दिन में नाम लेके उनका , सब छेड़ते हैं मुझे ..
रातों में फिर उनके खवाबों का आना जाना है
वो करीब है फिर नज़रे झुका के गुज़र जाना है..
उनके पास जाना कभी ,तो कभी लगता दूरियां बढ़ाना हैं ..
परी,साहिल के पास से गुजर बस सकती है..
स्थिर कदमो में मुश्किल ,इन लेहेरों का आना है..
क्या कहूँ ये सिलसिला मुश्किल लगता बताना है...
वो करीब है फिर नज़रें झुका के गुज़र जाना है...
Saturday, 14 January 2012
ये फासलें ..4
मुझे नहीं पता !! जिंदगी मुझे कहाँ ले जा रही है?
मुझे तलाश है उसकी ,जिसके बिना ये सफ़र अधूरा है..
कभी कभी डर लगता हैं इन ख्वाबो से,
कहीं भागते- भागते,उसकी तलाश में,
मैं कहीं तनहा न रह जाऊं....
आगे कोई हैं या नहीं क्या पता ?
सूनी-सूनी सी डगर लगती हैं..
जिसकी हैं तलाश मुझे,कहीं वो मेरे साथ तो नहीं..
जिंदगी कहती हैं ,एक दिन ये नज़र उसे पहचान ही लेगी..
आगे कोई हैं या नहीं क्या पता ?
सूनी-सूनी सी डगर लगती हैं..
जिसकी हैं तलाश मुझे,कहीं वो मेरे साथ तो नहीं..
Friday, 13 January 2012
प्यार नहीं था ...
आंख खुली तो खुशी का
संसार नहीं था ..
एक पल जीना उसके बेगेर
यु तो दुस्वार नहीं था ..
अपने तो बदले उसका गम
कुछ कम ही था !
जिसपे खुद से जादा भरोसा किया
वो भी बदल गया ...
इतना मुस्किल तो राह -ऐ -इन्तेहाँ नहीं था
कुचल के खवाब सारे ,
जब मेने अपनी देहलीज़ पार की ..
उसके सिवा और किसी का साथ नहीं था !
ये दिल की खुशनसीबी थी जो सह
गया दर्दो गम ..
वरना साँसों का चलना भी
आसान नहीं था !
मुझ बेखबर को कहाँ ..मालूम था की तनहा तय करना है ..
सफ़र ज़िन्दगी का
जब उसने कहा ,
"मुझे तुमसे प्यार नहीं था "
Wednesday, 11 January 2012
अनकही उलझन ... 3
सनसनाती हवाएं,नीले सागर की लेहेरें और आकाश में उड़तें आज़ाद से पंछी... अपने घर लौट रहे हैं, मैं हूँ बेसुक सी इस अनजान से जाने हुए शेहेर में,जैसे मैं कोई आशियाना ढून्ढ रही हूँ,अरे ! नहीं मेरा मतलब ये था की मैं मेरी मंजिल की तलाश कर रही हूँ.
अपनी रोजी रोटी के लिए घास काटते लोग देखे,पास की दीवार पे दो प्यार करने वालों का नाम,तो कहीं अपने साथियों के साथ मौज करता हुआ ग्रुप देखा,उन्हें देखते ही एक पल को मुझे मेरे दोस्तों की याद आ गयी,आजकल समय ही नहीं दे रही हूँ उनको जाने किस धुन में रहती हूँ ,कुछ देर वहाँ ओर बैठी मैं और गहरे पानी को निहारने लगी,सोचते-सोचते मैं ये सोचने लगी की ,इतने प्यारे से माहोल में आके किसी का मरने का मन कैसे हो सकता हैं?
आपके अन्दर अगर अच्छी सोच हैं,तो आप अच्छा ही करोगे.मुझे तो यहाँ आकर ऐसा लग रहा था,जैसे मुझे किसी ने यादों और खवाबों की किताब दे दी हो,पर मेरी मम्मा सच कहती हैं ,"बड़ा तालाब सबको अपनी ओर खीचता हैं "
मुझे भी खीचा,एक गहरी दुनिया के आलम में ले गया जहाँ मुझे भी मेरी खबर नहीं थी,जैसे मेरे ख्वाबों का जहाँ मेरे सामने था.
तभी मेरे कंधे में किसी ने हाथ रख दिया.(मुझे लगा पापा होंगे,वो कॉल में busyथे )
मेरा ध्यान बट सा गया,चारों ओर देखा कोई नहीं था,पर कोई तो हैं कहीं...जिसे मेरी इतने गहरी सोच में खोये रहना पसंद नहीं..(मेरे दोस्त भी मुझसे यही कहते हैं की ज्यादा सोचा मत कर)
ये सोचकर मैं अपनी पसंदिता जगह से बेमन से कार में आके बैठ गयी,पर मेरी नज़र को जैसे इस झील ने एक बंधन बाँध लिया था ..
" क्या सोच कर फिर हम इन किनारों पे आ गए..
बड़ी अनकही बातें लिए यादों के शिकारों पे आ गए..
जो ठहर गए वो उलझनों में जा डूबे,
जो उबर गए वो माझी के इशारो पे आ गए.."
Tuesday, 10 January 2012
अनकही उलझन ... 2
3/January/2012
सुबह कितनी खूबसूरत लगती हैं कोहरे के साथ,सर्दियों में सूरज की किरन जैसी राहत और कहाँ है? बहुत आकर्षक लगता है, जब ये किरने चेहरे पे पड़ती हैं ,ठिठुरती रात के बाद मुझे हमेशा इस प्यारी सी सुबह का इंतज़ार सा रहता है.इतनी ठण्ड में रात को नींद किसको आती हैं?पर रजाई से निकलने का मन नहीं करता. . . . .
कुछ देर करवट बदली ,फिर जरा हिम्मत करके रजाई से अपना हाथ निकाला ,टेबल पे हाथ फेरना शुरू कर दिया,जब कुछ हाथ नहीं लगा तो उठना ही पड़ा.. :(
हमेशा की तरह कंप्यूटर टेबल पे पड़ा था बेचारा मेरा सेल : (
जैसे-तैसे अँधेरे में,सेल ढून्ढ के वापस बेड में चली गयी,क्या है न ,अब अगर रात में 2 बजे मैं डायेरी लेके बैठ जाती तो सबका जाग जाना तय था...
"रात में अस्मा से,तारों के साथ,किसी का ख्वाब टूटता होगा,
याद आये जब मेरी,मुझसे मिलने को तरसता होगा,
मन मेरे मन ,क्या ...वो भी इस तरह कुछ सोचता होगा?
देर रात तक ,सुनी राहो को तनहा, क्या वो ताकता होगा,
खामोश लबों में कहीं कई राज़ वो रखता होगा,
मन मेरे मन ,क्या... वो भी इस तरह कुछ सोचता होगा?
रात को करवटें बदल कर,तकिए से अनकहे गम कहता होगा,
खुली आँखों से कई ख्वाब क्या वो भी देखता होगा...
मन मेरे मन ,क्या... वो भी इस तरह कुछ सोचता होगा? "
बस जाने क्यों यही अलफ़ाज़ मन में आये..टाइप करते करते कब सो गयी पता ही नहीं चला..
" कहने को हम कितना भी कह डाले,
कुछ बातें हर दम अनकही रह जाती है..
कहने को कितनी भी मुश्किले हल कर डाले,
उलझने हमेशा उलझने ही रह जाती है.... "
Friday, 6 January 2012
ये फासलें ......3
फासलों में भी,करीब जाने के
कई रास्ते दिखाती है,
बड़ी अजीब सी आदत अक्सर
जिंदगी दोहराती हैं..
कैसे भूल जाऊ ,उनकी कही
हर एक बातें याद आती है..
बड़ी अजीब सी आदत अक्सर
जिंदगी दोहराती हैं..
नामुमकिन उन मंजिलो से
क्यों वादियाँ टकराती है..
बड़ी अजीब सी आदत अक्सर
जिंदगी दोहराती हैं
शाम को सिन्दूरी अस्मा देखकर
खवाबों की कल्पना याद आती है,
बड़ी अजीब सी आदत अक्सर
जिंदगी दोहराती हैं
फासलों में भी,करीब जाने के
कई रास्ते दिखाती है..
बड़ी अजीब सी आदत अक्सर
जिंदगी दोहराती हैं..
शाम की किरन सा वो ...
शाम की किरन सा वो
मेरे साथ चल रहा है..
कहीं दूर फिजाओं में उसका अक्स सा है..
पलकों और जुल्फों के बीच एक रिश्ता सा कायम है..
सूरज डूबता हुआ जैसे ..
किसी के पास होने का पैगाम दे रहा है,
शाम की किरन सा वो
मेरे साथ चल रहा है..
हल्की-हल्की सी बारिश में रंग भरने आया है..
कहीं दूर आसमा में उसका चेहरा बन रहा है
शाम की किरन सा वो
मेरे साथ चल रहा है..
Tuesday, 3 January 2012
नज़रअंदाज़
"तू ही मिले दुआओं से हमें,खुदा से ये दरखास करते रहे
बया न हो जाये हाल-ऐ-दिल किसी को,तुम्हे नज़रअंदाज़ करते रहे ..
चुप रहे तेरे लिए रहे ,दिल के किसी कोने में ये राज़ रखते रहे
बया न हो जाये हाल-ऐ-दिल किसी को,तुम्हे नज़रअंदाज़ करते रहे ..''
मायूस किया हालात ने ,उसको कई बार ठुकराया
छुपते फिरे उससे हर जगह..सामने उसको ही पाया..
जाने क्यों जिंदगी मुझपे सितम किए जाती है..
"देखकर सामने उसको,मेरी नज़र थम सी जाती है.."
"तुझे देखकर खफा दिल को हर बार करते रहे
बया न हो जाये हाल-ऐ-दिल किसी को,तुम्हे नज़रअंदाज़ करते रहे ..
चुप रहे तेरे लिए रहे ,दिल के किसी कोने में ये राज़ रखते रहे
बया न हो जाये हाल-ऐ-दिल किसी को,तुम्हे नज़रअंदाज़ करते रहे ..''
Friday, 30 December 2011
Tuesday, 27 December 2011
उम्र की सीमा ...
"कुछ उम्र की सीमा
लिख दी तक़दीर ने
कुछ दूरियों का दौर
मिला तक़दीर से.."
कभी रास्ते कम पड़ने लगे..
कभी तुम अजनबी से लगने लगे..
"कहते हैं,खूबसूरत है हरेक अश्क
जो आँखों से, किसी के लिए चला आता हैं..
कितना गहरा रिश्ता है ,उस शख्स से आपका
पल में वो बयाँ कर जाता हैं...!"
क्यों हम फ़ासले कम करने लगे...
क्यों और कब तुम ,अपने से लगने लगे...
किसे ढूँढूं अब मैं,इन हाथ की लकीर में...
"कुछ उम्र की सीमा
लिख दी तक़दीर ने
कुछ दूरियों का दौर
मिला तक़दीर से..."
Friday, 23 December 2011
रिश्तों का पिंजरा ...
उससे कह दो मेरी ख्यालों में आना छोड़ दे
रिश्तों के पिंजरों में और उलझाना छोड़ दे
मालूम हैं बहुत तन्हा हूँ मैं खुद की तन्हाई से...
मुझको अब ये बताना छोड़ दे..
बड़ी तड़प होती हैं कई दिनों से
उससे कह दो ख्वाबों में ,मुझे जगाना छोड़ दे
सारी -सारी रातें उसकी बातें याद आती हैं
देख के करीब आना,मुस्कुराना छोड़ दे...
उससे कह दो मेरी ख्यालों में आना छोड़ दे
रिश्तों के पिंजरों में और उलझाना छोड़ दे.....
Saturday, 17 December 2011
दस्तक...
सुनती हूँ दस्तक किसी की इन लम्हातों में
नहीं रहा जिससे वास्ता सदियों जामानों से
अहाटें तो हुई थी पर कोई सामने न था,
लगता है यादें दरवाजो से टकराई होंगी..
यादों की टहनियों में बाकी बहुत किस्से हैं
देहलीज में बैठे दिखते,अब भी गली के वो पुराने हिस्से हैं ..
वो पुराने दिन,वो पुराने लोग, जाने किन राहों में कब बिछड़ते चले गए
कुछ याद हैं कुछ भूल गए, वो कौन से राजा और रानी थे..
सोने से पहले ,सुनते थे जो कहानी दादी और नानी से..
दादा जी सिखातें थे तहजीब,संस्कार
कितना याद आता है उनका हमें प्यार..
पापा की तरह कौन राह में तहलायेगा,
कौन पूरी करेगा मेरी हर ज़िद को?
माँ जैसा भी कोई कभी नहीं बन पायेगा..
कौन फिर इतना हमसे लाड़ जताएगा
हर कोई बस हमें जिंदगी के सही मायने सिखाएगा
देखते- देखते फिर सारा आलम बदल जायेगा
बचपन में खिलोने से खिलाया खूब जिंदगी ने
अब हालातों से खेलना सिखा रही है..
सुनती हूँ दस्तक किसकी इन लम्हातों में
नहीं रहा जिससे वास्ता सदियों जमानो से..
“बंदिशों के अलाम में पहरा सख्त लगता हैं
जिंदगी के माएनें सिखने में जरा वक़्त लगता हैं..”
Monday, 28 November 2011
Wednesday, 23 November 2011
ये फ़ासले...2
" एक शख्स का आपसे बार बार हर राह में टकराना ...ये इत्तेफाक है?किस्मत है?या दोनों अनचाहे रास्तों का मिलना ?नहीं पता .. "
यु तो मुझे एक ही शख्स बार बार हर मोड़ पर नहीं मिला, मेरे साथ आजतक ऐसा कभी नहीं हुआ...
क्यूंकि मुझे मेरी कहानियों वाली किताबी दुनिया से ही फुरसत नहीं रहती .
वाकई ! उसमें बहुत सही बातें लिखी होती हैं,पहले तो एक रोमांचक कहानी ,रहस्मयी मोड़ और फिर सीधे लफ्जों में लिखी एक टेढ़ी बात,जी हां !! टेढ़ी ही समझ लीजिये !!!!
और वैसे भी कहानियों में दुनिया जितनी खूबसूरत हमें दिखती है ना ! वो उतनी ही खोखली होती है,किसी हमारे जैसे इंसान ने ही उसका रूप सवारा है,एक कहानी गढ़ कर,वो अलग इन्सान... जो एक संघर्ष भरे सफ़र को भी अपनी आँखों से, बहुत साफ़- सुथरे तरीके से देखता आया हैं.
मम्मी कहती हैं ,ठीक ही कहती है ," कहानी पढ़कर ये नहीं सोचना चाहिए की जैसा उसके साथ हुआ तुम्हारे साथ भी होगा,सबकी अपनी जिंदगी है तक़दीर है,कुछ याद ही रखना है तो उस कहानी का नैतिक याद रखो,काम आयेगा ."
मैं जब भी सोचती हूँ,की आखिर मेरी कहानी क्या है..तो बस मुझे मेरे आस-पास भीड़ ही भीड़ नज़र आती हैं..पर मन कहता है,"भीड़ में भी कई राज़ है ,कोई न कोई तो होगा इस भीड़ में कहीं ..जो मेरी तरह कहीं लापता सा फिरता होगा.."
महसूस भी होता हैं, किसी का साथ ,मेरे साथ..पर मैं क्यों उससे अनजान सी हूँ फिर? शायद वो वही है..
शायद वो नहीं है..इन सवालातों में फिर.. किसी दिन उलझा जायेगा..
"ख्वाबो के रंग से ,उनके रंग मिले - जुले है..
बयां होते आँखों-आँखों में उनसे कई सिलसिले है..
क्यों यहाँ अधूरेपन के काफिले है,
तुम कहीं -- हम कहीं...
क्यों हमारे दर्मिया ये फ़ासले हैं.. ये फ़ासले हैं.."
Monday, 14 November 2011
कोई तो आये
आखिर कब कम होंगे,मेरी ज़िन्दगी के ये घने से सायें ..
ख्वाबों के रंग से,
कोई तो आये..
जो समझे न अनकहीं बातों को,लफ़्ज़ों में उन्हें किस तरह समझाए..
मन के दर्पण से ,
कोई तो आये..
खामोशियों में मेरी आहट उसकी है, अजनबी मुस्कुराहटों सा, मेरे गालों को छू जाए..
एहसास के दामन से,
कोई तो आये...
तन्हाई में सुनी वो बातें किसकी है ,रिमझिम बरसात में काश कहीं वो मिल जाये ..
बारिशों के मौसम से,
कोई तो आये...
Tuesday, 8 November 2011
क्या करे .
कैसे हुए हैं ये हालात क्या करे
हुए हैं उनकी साज़िस का शिकार क्या करे
उनकी आदत हैं दिल दुखाने की
हमको हुआ हैं प्यार तो हम क्या करे
इन राहों से हम यु अनजान तो नहीं थे..
हम इतने भी कभी नादान तो नहीं थे..
इतने हुए है वो ख़ास क्या करे
कोई कसूर उनका भी नहीं क्या करे
उनकी आदत हैं खफा हो जाने की..
हमको हुआ है प्यार तो हम क्या करे
कहते है जीने के लिए एक कमी जरूरी हैं
चंद लफ़ज़ों की तलाश हैं ,एक ग़ज़ल अधूरी हैं
कैसे हुए है वो पास क्या करे
थामकर हाथ पूछते हैं हाल तो इनकार क्या करे
उनकी आदत है रूठ जाने की
हमको हुआ हैं प्यार तो हम क्या करे
Saturday, 5 November 2011
कौन साथ देता हैं
कौन साथ देता हैं , अंधेरों में, रौशनी के बाद ?
हम तो निकल पड़े हैं , सफ़र में, अपनी परछाइयों के साथ ,
परछाइयां कम से कम धोखा तो नहीं देंगी .....
कहीं किसी मोड़ पर वो भी अपना दामन छुड़ा ही लेंगी ...
आदत हैं हमें रहने की ,अपनी तनहाइयों के साथ ...
कौन साथ देता हैं , अंधेरों में, रौशनी के बाद ?
हैं जिसकी तलाश ,मुझको वो हमसफ़र मिल ही जायेगा ..
रोज़ नज़र आता हैं सूरज ,रात की वीरानियों के बाद ...
Wednesday, 21 September 2011
मेरी कहानी
कहानी पढना और उनमे खो जाना ,
मेरी आदत है ..
मैं हर तरह की कहानियाँ पढ़ती हूँ ,
कई कहानी मन को गुदगुदाती है ,
कई हसी की एक लहर छोड़ जाती है ,
कई दिल को पिघलने पे मजबूर कर देती है ,
कई कहानियाँ कुछ बातें सोचने को कहती है ,
कई कहानियों का अंत नहीं मिलता ,
तो कईयों की शुरुवात नहीं मिलती ,
कई कहानी अधूरी रह जाती है ..
तो कई पूरी होने पर भी पूरी नहीं है ,
कई कहानियाँ एक अच्छा पैगाम देती है ,
कई कहानियाँ सवालों के पिंजरे में उलझी सी रहती हैं ,
कई कहानी जीने की सीख देती है ,
तो कई कहानियों में जीने की ही वजह नहीं है .....
मैं अब भी एक सोच में डूबी सी हूँ ,
की आखिर ..मेरी कहानी कैसी होगी ?
इन सब से मिलती - जुलती या फिर ,
थोड़ी अलग सी ,या इन सब से जुदा ही होगी ..
बड़ा मुश्किल है ना ? कहानी में आगे ,क्या होगा ये जानना ..
हर कहानी के हर एक पन्नों में कुछ नयी सी बातें बयां है
वैसे ही हर दिन इस कहानी का एक नया सिलसिला -सा है
इन्हें पलटते -पलटते एक दिन मेरी भी कहानी बन ही जाएगी..
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सच ही कहा है किसी ने .. नहीं यहाँ किसी का ठिकाना तुम भी जा रहे हो अब करके नया एक बहाना... चाहा उन्हें शामो शेहेर...
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कभी कसमों तो कभी वादों से डर लगता हैं निहार के आस्मा की ऊचाईयों को..छूने का दिल करता हैं ! हैं तमन्ना वो खुद ही एक दफा पहेल करे.. कभ...



































