Saturday, 14 January 2012

ये फासलें ..4

 
 
मुझे नहीं पता !! जिंदगी मुझे कहाँ ले जा रही है?
मुझे तलाश है उसकी ,जिसके बिना ये सफ़र अधूरा है..

कभी कभी डर लगता हैं इन ख्वाबो से,
कहीं भागते- भागते,उसकी तलाश में,
मैं कहीं तनहा न रह जाऊं....
 
आगे कोई हैं या नहीं क्या पता  ?
सूनी-सूनी सी डगर लगती हैं..

जिसकी हैं तलाश मुझे,
कहीं वो मेरे साथ तो नहीं.. 
जिंदगी कहती हैं ,एक दिन ये नज़र उसे पहचान ही लेगी..
 
 
 

Friday, 13 January 2012

प्यार नहीं था ...

 
 
आंख खुली तो खुशी का

संसार नहीं था ..

एक पल जीना उसके बेगेर

यु तो दुस्वार नहीं था ..

अपने तो बदले उसका गम

कुछ कम ही था !

जिसपे खुद से जादा भरोसा किया

वो भी बदल गया ...

इतना मुस्किल तो राह -ऐ -इन्तेहाँ नहीं था

कुचल के खवाब सारे ,

जब मेने अपनी देहलीज़ पार की ..

उसके सिवा और किसी का साथ नहीं था !

ये दिल की खुशनसीबी थी जो सह

गया दर्दो गम ..

वरना साँसों का चलना भी

आसान नहीं था !

मुझ बेखबर को कहाँ ..मालूम था की तनहा तय करना है ..

सफ़र ज़िन्दगी का

जब उसने कहा ,

"मुझे तुमसे प्यार नहीं था "  


Wednesday, 11 January 2012

अनकही उलझन ... 3




सनसनाती हवाएं,नीले सागर की लेहेरें और आकाश में उड़तें आज़ाद से पंछी... अपने घर लौट रहे हैं, मैं हूँ बेसुक सी इस अनजान से जाने हुए शेहेर में,जैसे मैं कोई आशियाना ढून्ढ रही हूँ,अरे ! नहीं मेरा मतलब ये था की मैं मेरी मंजिल की तलाश कर रही हूँ.

अपनी रोजी रोटी के लिए घास काटते लोग देखे,पास की दीवार पे दो प्यार करने वालों का नाम,तो कहीं अपने साथियों के साथ मौज करता हुआ ग्रुप देखा,उन्हें देखते ही एक पल को मुझे मेरे दोस्तों की याद आ गयी,आजकल समय ही नहीं दे रही हूँ उनको जाने किस धुन में रहती हूँ ,कुछ देर वहाँ ओर बैठी मैं और गहरे पानी को निहारने लगी,सोचते-सोचते मैं ये सोचने लगी की ,इतने प्यारे से माहोल में आके किसी का मरने का मन कैसे हो सकता हैं?



आपके अन्दर अगर अच्छी सोच हैं,तो आप अच्छा ही करोगे.मुझे तो यहाँ आकर ऐसा लग रहा था,जैसे मुझे किसी ने यादों और खवाबों की किताब दे दी हो,पर मेरी मम्मा सच कहती हैं ,"बड़ा तालाब सबको अपनी ओर खीचता हैं "
मुझे भी खीचा,एक गहरी दुनिया के आलम में ले गया जहाँ मुझे भी मेरी खबर नहीं थी,जैसे मेरे ख्वाबों का जहाँ मेरे सामने था.
तभी मेरे कंधे में किसी ने हाथ रख दिया.(मुझे लगा पापा होंगे,वो कॉल में busyथे )
मेरा ध्यान बट सा गया,चारों ओर देखा कोई नहीं था,पर कोई तो हैं कहीं...जिसे मेरी इतने गहरी सोच में खोये रहना पसंद नहीं..(मेरे दोस्त भी मुझसे यही कहते हैं की ज्यादा सोचा मत कर)

ये सोचकर मैं अपनी पसंदिता जगह से बेमन से कार में आके बैठ गयी,पर मेरी नज़र को जैसे इस झील ने एक बंधन बाँध लिया था ..




                                 "   क्या सोच कर फिर हम इन किनारों पे आ गए..
                                   बड़ी अनकही बातें लिए यादों के शिकारों पे आ गए..
                                    जो ठहर गए वो उलझनों में  जा डूबे,
                                 जो उबर गए वो माझी के इशारो पे आ गए.."









Tuesday, 10 January 2012

अनकही उलझन ... 2




3/January/2012

सुबह कितनी खूबसूरत लगती हैं कोहरे के साथ,सर्दियों में सूरज की किरन जैसी राहत और कहाँ है? बहुत आकर्षक लगता है, जब ये किरने चेहरे पे पड़ती हैं ,ठिठुरती रात के बाद मुझे हमेशा इस प्यारी सी सुबह का इंतज़ार सा रहता है.इतनी ठण्ड में रात को नींद किसको आती हैं?पर रजाई से निकलने का मन नहीं करता. . . . .
कुछ देर करवट बदली ,फिर जरा हिम्मत करके रजाई से अपना हाथ निकाला ,टेबल पे हाथ फेरना शुरू कर दिया,जब कुछ हाथ नहीं लगा तो उठना ही पड़ा.. :( 
हमेशा की तरह कंप्यूटर टेबल पे पड़ा था बेचारा मेरा सेल : (
जैसे-तैसे अँधेरे में,सेल ढून्ढ के वापस बेड में चली गयी,क्या है न ,अब अगर रात में 2 बजे मैं डायेरी लेके बैठ जाती तो सबका जाग जाना तय था...




"रात में अस्मा से,तारों के साथ,किसी का ख्वाब टूटता होगा,

याद आये जब मेरी,मुझसे मिलने को तरसता होगा,

मन मेरे मन ,क्या ...वो भी इस तरह कुछ सोचता होगा?


देर रात तक ,सुनी राहो को तनहा, क्या वो ताकता होगा,

खामोश लबों में कहीं कई राज़ वो रखता होगा,

मन मेरे मन ,क्या... वो भी इस तरह कुछ सोचता होगा?


रात को करवटें बदल कर,तकिए से अनकहे गम कहता होगा,

खुली आँखों से कई ख्वाब क्या वो भी देखता होगा...
मन मेरे मन ,क्या... वो भी इस तरह कुछ सोचता होगा? "



 बस जाने क्यों यही अलफ़ाज़ मन में आये..टाइप करते करते कब सो गयी पता ही नहीं चला..
  




                                       "  कहने को हम कितना भी कह डाले,
                                         कुछ बातें हर दम अनकही रह जाती है..
                                         कहने को कितनी भी मुश्किले हल कर डाले,
                                          उलझने हमेशा उलझने
ही रह जाती है.... "










Friday, 6 January 2012

ये फासलें ......3




फासलों में भी,करीब जाने के
कई रास्ते दिखाती है,

बड़ी अजीब सी आदत अक्सर
जिंदगी दोहराती हैं..



कैसे भूल जाऊ ,उनकी कही
हर एक बातें याद आती है..
बड़ी अजीब सी आदत अक्सर
जिंदगी दोहराती हैं..


नामुमकिन उन मंजिलो से
क्यों वादियाँ टकराती है..
बड़ी अजीब सी आदत अक्सर
जिंदगी दोहराती हैं



शाम को सिन्दूरी अस्मा देखकर
खवाबों की कल्पना याद आती है,
बड़ी अजीब सी आदत अक्सर
जिंदगी दोहराती हैं


फासलों में भी,करीब जाने के
कई रास्ते दिखाती है..

बड़ी अजीब सी आदत अक्सर
जिंदगी दोहराती हैं..






शाम की किरन सा वो ...


शाम की किरन सा वो
मेरे साथ चल रहा है..

कहीं दूर फिजाओं में उसका अक्स सा है..
पलकों और जुल्फों के बीच एक रिश्ता सा कायम है..

सूरज डूबता हुआ जैसे ..
किसी के पास होने का पैगाम दे रहा है,


शाम की किरन सा वो
मेरे साथ चल रहा है..

हल्की-हल्की सी बारिश  में रंग भरने आया है..
कहीं दूर आसमा में उसका चेहरा बन रहा है


शाम की किरन सा वो
मेरे साथ चल रहा है..


Tuesday, 3 January 2012

नज़रअंदाज़




"तू ही मिले दुआओं से हमें,खुदा से ये दरखास करते रहे
बया न हो जाये हाल-ऐ-दिल किसी को,तुम्हे नज़रअंदाज़ करते रहे ..
चुप रहे तेरे लिए रहे ,दिल के किसी कोने में ये राज़ रखते रहे
बया न हो जाये हाल-ऐ-दिल किसी को,तुम्हे नज़रअंदाज़ करते रहे ..''



मायूस किया हालात ने ,उसको कई बार ठुकराया
छुपते फिरे उससे हर जगह..सामने उसको ही पाया..

जाने क्यों जिंदगी मुझपे सितम किए जाती है..
"देखकर सामने उसको,मेरी नज़र थम सी जाती है.."



"तुझे देखकर खफा दिल को हर बार करते रहे
बया न हो जाये हाल-ऐ-दिल किसी को,तुम्हे नज़रअंदाज़ करते रहे ..
चुप रहे तेरे लिए रहे ,दिल के किसी कोने में ये राज़ रखते रहे
बया न हो जाये हाल-ऐ-दिल किसी को,तुम्हे नज़रअंदाज़ करते रहे ..''


Friday, 30 December 2011

ख़ामोशी की वजह..


उन्हें लगता हैं हम रहते हैं उनसे खफा,
नाराज़गी बया कर देते है वो यु बेवजह
क्या हो गया कब ,मुझे भी नहीं पता..
खामोश करके पूछते हैं ख़ामोशी की वजह..
          



Tuesday, 27 December 2011

उम्र की सीमा ...




"कुछ उम्र की सीमा
लिख दी तक़दीर ने
कुछ दूरियों का दौर
 मिला तक़दीर से.."

कभी रास्ते कम पड़ने लगे..
कभी तुम अजनबी से लगने लगे..


"कहते हैं,खूबसूरत है हरेक अश्क
जो आँखों से, किसी के लिए चला आता हैं..
कितना गहरा रिश्ता  है ,उस शख्स से आपका
पल में वो बयाँ कर जाता हैं...!"


 

क्यों हम फ़ासले कम करने लगे...
क्यों और कब तुम ,अपने से लगने लगे...

किसे ढूँढूं अब मैं,इन हाथ की लकीर में...

 
"कुछ उम्र की सीमा
लिख दी तक़दीर ने
कुछ दूरियों का दौर
 मिला तक़दीर से..."








Friday, 23 December 2011

रिश्तों का पिंजरा ...



उससे कह दो मेरी ख्यालों में आना छोड़ दे
रिश्तों के पिंजरों में और उलझाना छोड़ दे

मालूम हैं बहुत तन्हा हूँ मैं खुद की तन्हाई से...
 मुझको अब ये बताना छोड़ दे..

बड़ी तड़प होती हैं कई दिनों से
उससे कह दो ख्वाबों में ,मुझे जगाना छोड़ दे

सारी -सारी रातें उसकी बातें याद आती हैं
देख के करीब आना,मुस्कुराना छोड़ दे...

उससे कह दो मेरी ख्यालों में आना छोड़ दे
रिश्तों के पिंजरों में और उलझाना छोड़ दे.....






Saturday, 17 December 2011

दस्तक...




सुनती हूँ  दस्तक किसी की इन लम्हातों में
नहीं रहा जिससे वास्ता सदियों जामानों से

अहाटें तो  हुई थी पर कोई सामने था,
लगता है यादें दरवाजो से टकराई होंगी..

यादों की टहनियों में बाकी बहुत किस्से हैं
देहलीज में बैठे दिखते,अब भी गली के वो पुराने हिस्से हैं ..
वो पुराने दिन,वो पुराने लोग, जाने किन राहों में कब बिछड़ते चले गए

कुछ याद हैं कुछ भूल गए, वो कौन से राजा और रानी थे..
सोने से पहले ,सुनते थे जो कहानी दादी और नानी से..
दादा जी सिखातें थे तहजीब,संस्कार 
कितना याद आता है उनका हमें प्यार..
पापा की तरह कौन राह में तहलायेगा,
कौन पूरी करेगा मेरी हर ज़िद को?
माँ जैसा भी कोई कभी नहीं बन पायेगा..

कौन फिर इतना हमसे लाड़ जताएगा
हर कोई बस हमें जिंदगी के सही मायने सिखाएगा
देखते- देखते फिर सारा आलम बदल जायेगा
बचपन में खिलोने से खिलाया खूब जिंदगी ने
अब हालातों से खेलना सिखा रही है..

सुनती हूँ दस्तक किसकी  इन लम्हातों  में
नहीं रहा जिससे वास्ता सदियों जमानो से..


बंदिशों के अलाम में पहरा सख्त लगता हैं
जिंदगी के माएनें सिखने में जरा वक़्त लगता हैं..”

Monday, 28 November 2011

चंचल मन ...





जो जाता हैं जाने दो,अगर वो कभी वापस आये..
जो उसे ठुकराओ भी नहीं और अपनाओ भी मत..
ठुकराओ इसलिए नहीं की उसने तुम्हे कभी ठुकराया था..
और अपनाओ इसलिए नहीं,
की चंचल मन को काबू करना,हवा के झोके को हाथ में कैद करने सा है !
















Wednesday, 23 November 2011

ये फ़ासले...2

 
 
" एक शख्स का आपसे बार बार हर राह में टकराना ...ये इत्तेफाक है?किस्मत है?या दोनों अनचाहे रास्तों का मिलना ?नहीं पता .. "

यु तो मुझे एक ही शख्स बार बार हर मोड़ पर नहीं मिला, मेरे साथ आजतक ऐसा कभी नहीं हुआ...
क्यूंकि मुझे मेरी कहानियों वाली किताबी दुनिया से ही फुरसत नहीं रहती .

वाकई ! उसमें बहुत सही बातें लिखी होती हैं,पहले तो एक रोमांचक कहानी ,रहस्मयी मोड़ और फिर  सीधे  लफ्जों में लिखी एक टेढ़ी बात,जी हां !! टेढ़ी ही समझ लीजिये !!!!

और वैसे भी कहानियों में दुनिया जितनी खूबसूरत हमें दिखती है ना ! वो उतनी ही खोखली होती है,किसी हमारे जैसे इंसान ने ही उसका रूप सवारा है,एक कहानी गढ़ कर,वो अलग इन्सान... जो एक संघर्ष भरे सफ़र को भी अपनी आँखों से, बहुत साफ़- सुथरे तरीके से देखता आया  हैं.

मम्मी कहती हैं ,ठीक ही कहती है ," कहानी पढ़कर ये नहीं सोचना चाहिए की जैसा उसके साथ हुआ तुम्हारे साथ भी होगा,सबकी अपनी जिंदगी है तक़दीर है,कुछ याद ही रखना है तो उस कहानी का नैतिक याद रखो,काम आयेगा  ."

मैं जब भी सोचती हूँ,की आखिर मेरी कहानी क्या है..तो बस मुझे मेरे आस-पास भीड़ ही भीड़ नज़र आती हैं..पर मन कहता है,"भीड़ में भी कई राज़ है ,कोई न कोई तो होगा इस भीड़ में कहीं ..जो मेरी तरह कहीं लापता सा फिरता होगा.."

महसूस भी होता हैं, किसी का साथ ,मेरे साथ..पर मैं क्यों उससे अनजान सी हूँ फिर? शायद वो वही है..
शायद वो नहीं है..इन सवालातों में फिर.. किसी दिन उलझा जायेगा..





"ख्वाबो के रंग से ,उनके रंग मिले - जुले है..
बयां होते आँखों-आँखों में उनसे कई  सिलसिले है..
क्यों यहाँ अधूरेपन के काफिले है,
तुम कहीं -- हम कहीं...
क्यों हमारे दर्मिया ये फ़ासले
हैं.. ये फ़ासले हैं.."



Sunday, 20 November 2011




एक खूबसूरत सा पल है वो मेरी किताबी जिंदगी का..
जिसने मेरा रिश्ता कागज़ कालमो से जोड़ दिया हैं...
वो पहेलियों की तरह मेरी कविताओं, मेरी गजलों में उलझा सा है...

इसके आगे क्या करू मैं हाल-ये-दिल बया
खुली आँखों से देखे सपने कहा सच होते है ....?




Monday, 14 November 2011

कोई तो आये




आखिर कब कम होंगे,मेरी ज़िन्दगी के ये घने से सायें ..
ख्वाबों  के रंग से,
कोई तो आये..

जो समझे न अनकहीं बातों को,लफ़्ज़ों में उन्हें किस तरह समझाए..
मन के दर्पण से ,
कोई तो आये..

खामोशियों में मेरी आहट उसकी है, अजनबी मुस्कुराहटों सा, मेरे गालों को छू जाए..
एहसास के दामन  से,
कोई तो आये...


तन्हाई में सुनी वो बातें किसकी है ,रिमझिम बरसात में काश कहीं वो मिल जाये ..
बारिशों के मौसम से,
कोई तो आये...

Tuesday, 8 November 2011

क्या करे .







कैसे हुए हैं ये  हालात क्या करे 
हुए हैं उनकी साज़िस का शिकार क्या करे
उनकी आदत हैं दिल दुखाने की 
हमको हुआ हैं प्यार तो हम क्या करे


इन राहों से हम यु अनजान तो नहीं थे.. 
हम इतने भी कभी नादान तो नहीं थे..


इतने  हुए है वो ख़ास क्या करे 
कोई कसूर उनका भी नहीं क्या करे 
उनकी आदत हैं खफा हो जाने की..
हमको हुआ है प्यार तो हम क्या करे


कहते है जीने के लिए एक कमी जरूरी हैं 
चंद लफ़ज़ों की तलाश हैं ,एक ग़ज़ल अधूरी हैं 

कैसे हुए है वो पास क्या करे
थामकर हाथ पूछते हैं हाल तो इनकार क्या करे
उनकी आदत है रूठ जाने की 
हमको हुआ हैं प्यार तो हम क्या करे



Saturday, 5 November 2011

कौन साथ देता हैं




कौन  साथ  देता  हैं , अंधेरों  में, रौशनी  के  बाद ?

हम  तो  निकल  पड़े  हैं ,  सफ़र  में,  अपनी  परछाइयों के  साथ ,
परछाइयां  कम से  कम  धोखा  तो  नहीं  देंगी .....

कहीं  किसी  मोड़  पर  वो  भी  अपना  दामन  छुड़ा  ही  लेंगी ...
आदत   हैं  हमें  रहने  की ,अपनी  तनहाइयों  के  साथ ...

कौन  साथ  देता  हैं , अंधेरों  में, रौशनी  के  बाद ?

हैं जिसकी  तलाश  ,मुझको  वो  हमसफ़र  मिल  ही  जायेगा ..
रोज़ नज़र  आता  हैं  सूरज ,रात  की   वीरानियों  के  बाद ...

Wednesday, 21 September 2011

मेरी कहानी





कहानी  पढना   और  उनमे  खो  जाना ,
मेरी  आदत   है ..
मैं   हर  तरह  की   कहानियाँ  पढ़ती  हूँ ,
कई  कहानी  मन  को  गुदगुदाती  है ,
कई  हसी की एक  लहर  छोड़  जाती  है ,
कई  दिल  को  पिघलने  पे  मजबूर  कर  देती  है ,
कई  कहानियाँ   कुछ  बातें  सोचने  को  कहती  है ,
कई   कहानियों  का  अंत  नहीं  मिलता ,
तो  कईयों  की  शुरुवात नहीं  मिलती ,


कई  कहानी  अधूरी  रह जाती  है ..
तो  कई  पूरी  होने  पर  भी  पूरी  नहीं  है ,
कई  कहानियाँ  एक  अच्छा  पैगाम  देती  है ,
कई  कहानियाँ  सवालों  के  पिंजरे  में  उलझी   सी  रहती  हैं ,
कई  कहानी  जीने  की  सीख  देती  है ,
तो  कई  कहानियों  में  जीने  की  ही वजह  नहीं  है .....




मैं  अब  भी  एक  सोच  में  डूबी  सी  हूँ ,

की आखिर  ..मेरी  कहानी  कैसी  होगी ?

 इन  सब से  मिलती - जुलती  या  फिर ,
थोड़ी  अलग  सी ,या  इन  सब  से  जुदा  ही  होगी ..

बड़ा  मुश्किल  है  ना ? कहानी  में  आगे ,क्या  होगा  ये  जानना ..
  हर कहानी के
हर एक  पन्नों में कुछ नयी सी बातें बयां  है
 वैसे ही हर दिन  इस कहानी का एक नया सिलसिला -सा  है
इन्हें पलटते -पलटते एक
दिन मेरी भी कहानी बन ही जाएगी..


                                         







Friday, 15 July 2011

♥PaRi...кєѕα нє кση нє ωσ נαηє кαнα нє♥ ..2

                                   
अब रातें   बहुत  बड़ी  लगती है   , उसने  आज  मुझसे  मेरी  पिछली  ज़िन्दगी  के  बारे  में  सवाल  किया ,कैसे  कहू  क्या  बताऊ  उसे ?किसी से कहने से भी क्या फायेदा जब वो इंसान आपकी भावनाए ही ना समझता हो,बहुत कम मिलते है ऐसे जो बिना कहे ही अंदाज़ा लगा लेते है...और कुछ ऐसे भी है कहने पर भी नहीं समझते.

मैं  उसे  क्या  किसी  को  भी  सच  बताने  से  कतरा  सी  जाती  हूँ , जब  कोई  कर  बैठता  है  मुझसे  ये  मुश्किल  सवाल ..
बहुत  मुश्किल  हो  जाता  है  जवाब  देना.

शायद  वो  सवाल  इतना  भी  मुश्किल  नहीं  है ,मुश्किल  मैंने  अपने  लिए  खुद  बना  ली  है
आजकल  तो  और  भी उलझाने जुड़ गयी है, हाँ, वही
  अनकही  सी उलझाने जिन्हें  कहना  चाहकर भी नहीं कहना चाहती
 

ज़िन्दगी  बिखरे  पत्तों   की   तरह  जुदा  होती  जा  रही  है  ..




आज आँखों में नींद ने दस्तक भी नहीं दी है,बस यादों ने खुली आँखों से ख्वाब बुनने शुरू  कर दिए है.
बहुत उत्साहित थी मैं ,ये सोचकर की अपनी ज़िन्दगी का आज हर एक राज़ खोल दूंगी..फिर मन में कोई बोझ लेके जीना नहीं होगा..


 आज का पता नहीं कुछ , मेरे कल में सिर्फ वो था..

वो कहता है जिंदगी सबको एक मौका देती है,पर तुम्हे जिंदगी को मौका देना है ,वो तुम्हे नहीं दे सकती.इतना कहकर वो जाने लगा ,मैं चुप चाप बस उसे देखती रह गयी..कुछ समझ नहीं आया के उससे मैं क्या कहूँ?"मैं उसे ये भी यकीन नहीं दिला सकती की हाँ यह मुमकिन है !!! तुम रुक जाओ.

"जिसे रुकना होता है ,वो बिना कहे ही रुक जाता है..क्या पता उसका साथ मेरी जिंदगी में यही तक था? मैं अकेली हूँ ,ये फिर से बाताने के  लिए "शुक्रिया" , मुझे इस तरह ही जीने ही आदत-सी हो गयी है..

वो अपनी डायरी  से अपने दिन भर का हाल बता रही है....

उसकी माँ उसके रूम की रोशनी देखकर वहा आ गयी और कहा ,"रात को क्या कहानी लिखने बैठ गयी है ?चल सो जा..अब "
 


 वो जितना सोचती है, जिंदगी उसे उतनी  ही उलझनों में डाल देती है. 
वो  पूरी रात बस यही सोचती रही की "   वो क्यों ?और कहाँ ? चला गया?"



जिंदगी की कसमकस में जहाँ ,वो उलझी हुई थी,वहा वो फिर वापस आ गया और कहने लगा," तुम्हे क्या लगा ?मैं भी औरों की तरह  इतनी जल्दी चला जाऊंगा,तुम ही बस अपने फैसले में अडिग रह सकती हो  ?"पता है तुम  जहाँ  हो,वहां से निकलना जरा मुश्किल है ,पर कोई बताएगा नामुमकिन क्या है इस दुनिया में??"






"कोई ठेहेरता  नहीं किसी के लिए...
वक़्त रुकता नहीं किसी के  लिए ,
फिर क्यूँ मैं  तुम्हारे लिए थम सी गयी हूँ.... !!!!!!!






Tuesday, 21 June 2011

अनकही उलझन ..1



"मैंने उसे सपनों में देखा है,तो  फिर  उस शख्स  जैसा  अभी  तक  कोई मुझे क्यूँ नहीं मिला?
क्या सपनो का हकीकत से कोई सम्बन्ध नहीं हैं.

कभी वो मुझे मेरी कहानियों में दिखाई देता है ,तो कभी कई अनकहे सवालों में ..
क्या पता शायद वो वही है जिसे मैं जानती नहीं हूँ... "


"बाकी बातें बाद मैं करुँगी तुमसे,अभी देरी हो गयी है मुझे."
 जल्दी बाज़ी में ,मैं निकल तो गयी,पर मेरी माँ रोज की तरह मुझे यह कहते हुए कॉलेज  के लिए बिदा कर रही है की " ना जाने सुबह- सुबह किससे बतियाती रहती है ??" पर माँ सब कुछ समझती है !!!


और आदत अनुसार पापा ने कहा, "छोटी ,तेरी बस छूट जाएगी.."

मन में मुस्कुराकर मैं फिर घर से निकल गयी.ये सोचते हुए की आज का दिन अच्छा जाने वाला है या बहुत बुरा,शाम को में घर किस सोच,किस परेशानी के साथ लौटूंगी,एक पल को मेरा मन ,दिल खाली नहीं होता, शायद इसलिए मुझे किसी से शिकायत नहीं है,खुद से फुर्सत मिले तब तो किसी के बारे में सोचू मैं.



कभी- कभी तो मुझे खुद पता नहीं चलता की मेरे आस पास हो क्या रहा हैं?
बहुत अच्छा लगता है अपनी ही दुनिया,सपनों में खोया सा रहना,और कभी इन्ही सपनो से डर सा लगता है.


मेरी माँ कहती है ,ज्यादा नहीं सोचना चाहिए,पर मैं ज्यादा सोचती हूँ,सोच को रोकना मुझे नहीं आता.


पर लोगों को मुझे  अपनी सोच से रूबरू भी नहीं कराना आता ,जो,जो सोचता है सोचे मुझे फरक नहीं पड़ता,कौन क्या कहता है ,क्या करता है,सबके अपने उसूल है,सब अपनी तरह जीए तो अच्छा है.


जैसे मैं, मेरी तरह ही हूँ,और मुझे अच्छा लगता है इस तरह रहना !!!!



घर से मैं कितनी सारी सोच लेके निकलती हूँ,और कॉलेज आते -आते,कुछ बातें पीछे छूट जाती हैं,जिनका छूटना मुझे अच्छा सा लगता हैं.
पर एक चीज है जो मुझसे कभी अलग नहीं होती,एक एहसास किसी का..
जो मुझसे कहीं दूर तो हैं,पर हमेशा मेरे साथ रहता हैं.
मैं नहीं जानती वो कौन हैं?

कभी ना कभी ज़िन्दगी,उससे भी सामना करवा ही देगी ..


अरे !! देखा मैं कॉलेज पहुंचते  -पहुंचते कहा पहुच गयी ?ये रोज़ की नहीं,सदियों और सालों की बात हैं," की मैं न मैं ही हूँ,और कभी नहीं सुधरने वाली,ऐसा मैं नहीं सब कहते हैं."  मैं  सबकी बात से सहमत हूँ.


शाम को घर आते ही मुरझा से जाते हैं,और कभी अगर अच्छे मन से वापस आये तो,थकने के बाद भी धूम मचा देते हैं ,सब फिर मेरे सो जाने का इंतज़ार करते है ताकि सब शान्ति के साथ  उनके वो सड़े हुए TV serial  देख पाए..:-(
उनकी मनोकामना  god कभी-कभी  सुन लेता है,और मैं अपने सेल फ़ोन से खेलते -खेलते सो जाती हूँ..





और जब नींद नहीं आती तो अपनी secret  diary  के साथ कुछ time  spent  करना अच्छा लगता हैं ..और आज मैंने कुछ पुराने पन्ने ही  पलटने  शुरू कर दिए..


कितने पुराने वो चुके है उसके पन्ने ,उसमे रखे फूलों से खुशबू आ रही है,उसे खोलते ही पुराने बीते दिनों की कुछ यादे ताज़ा सी हो गयी,जैसे सब कुछ मेरे सामने था
"ओह !! ये क्या लिखा है मैंने !!!" हँसी आती हैं अब पढके,यु तो मुझे बिलकुल  भी पसंद नहीं था ,अपनी रोज के बीतें दिनों के बारे में कुछ भी लिखना पर जो मैंने लिखा था,उसको पढ़कर  वाकई
हँसी आ रही थी.

 लो अब ये ट्रिंग- ट्रिंग फ़ोन की,जब भी मैं खुद से बात करने की कोशिश करती हूँ  ,कुछ न कुछ जरूर होता हैं.

मेरी माँ भी बोलने लगी ," उठा क्यों नहीं लेती फ़ोन?कबसे बज रहा हैं?क्या करती रहती है?"
 

अब उन्हें क्या बताये की क्या करते और सोचते रहते है?शेतानी दिमाक एक जगह रहना ही नहीं चाहता..

फ़ोन तो उठा लिया,पर कुछ समझ में तो आ ही नहीं रहा था, अब भला बताओ  हम किसी और दुनिया में है तो किसी की बात कैसे पल्ले पड़ेगी?

और अगर हम अपनी दुनिया में हो तब भी एक परेशानी ही है,फिर तो मन करता है सबसे ढेर सारी बातें कर डाले,बातें -किस्से ही ख़तम नहीं होते हमारे,फिर चाहे वो कोई भी हो...


 ""फिर रास्ते मिलेंगे,
फिर मंजिल बुलाएगी हमे,
कभी हमसे,फिर रूबरू करवाएगी तुम्हे..
तुम कौन हो..
हम कौन है...
दोनों को ही है उलझन..
ये अनकही उलझाने ,एक दिन समझ में आयेगी हमे.









बदसुलूकी