Friday, 6 April 2012

ये फासलें....



मेरी सोती आँखों में भी ,उसके ख्वाबों का सवेरा रहता हैं
 जाने कैसे लोग चैन से सो जाते हैं ?
मेरी जागती आँखों में भी,उसके अक्स का ही बसेरा रहता है
 जाने कैसे लोग चैन से सो जाते हैं ?


मेरी अमावस रातो में भी,रोशन अँधेरा रहता हैं..
जाने क्यों लोग चिरागों की लौ जलाते हैं?
मेरे साथ न होके भी,वो साथ हमेशा रहता हैं,
जाने कैसे लोग फासलों में दिन बिताते हैं..







No comments:

Post a Comment

बदसुलूकी