Monday, 2 April 2012

एक और ख्वाब...



एक और ख्वाब ,आज फिर देख लूं
बरसती खुशियाँ ,इन बाहों में समेट लूं
साथ न होके,कैसे कोई साथ हो जाता हैं?
वो कहे तो फिर से ,मैं जीना सीख लूं..


एक और ख्वाब ,आज फिर देख लूं..
बिखरती हसी,इन लबों में भर लूं..
अजनबी होके,कैसे कोई ख़ास हो जाता हैं?
वो कहे तो फिर से ,मैं जीना सीख लूं..


No comments:

Post a Comment

बदसुलूकी