Saturday, 24 March 2012

सैलाब


कही उसका ये कोई इशारा तो नहीं
कही उसने फिर मुझे निहारा तो नहीं
हर लहर की तरंग में कुछ कशमकस हैं
 कही उसने फिर मुझे पुकारा तो नहीं

लगती हैं ये शुरुवात नयी...
दिल मेरा बंज़र हैं,
आँखों में हैं ख्वाब कई..
ये कौन सा मंज़र हैं ?

यादों का सैलाब हैं,कोई ख़ास सा हैं..
वो मेरी कल्पना,मेरा इतिहास सा हैं..
कुछ छुआन का असर ,उसके एहसास सा हैं..
वो दूर कहीं ,मेरे आस पास सा हैं..

कही उसका ये कोई इशारा तो नहीं
कही उसने फिर मुझे निहारा तो नहीं
हर लहर की तरंग में कुछ कशमकस हैं
 कही उसने फिर मुझे पुकारा तो नहीं
..



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बदसुलूकी